Sunday, 23 August, 2009

संघ का शिगूफा(?) और चैनल का ज्ञान..

आज सुबह सुबह स्वनामधन्य चैनल स्टार न्यूज पर बड़े जोर शोर एक खबर ब्रेकिंग न्यूज बन कर आयी "संघ का नया शिगूफा"। इसमें संघ प्रमुख के जम्मू में दिए गए बयान को आधार बना कर कहा गया की उन्होंने पंडित नेहरू द्वारा स्वयंसेवकों को गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने के आमंत्रण की बात कह कर नया शिगूफा छोड़ा है।

खबरों का सवेदनशील काम कराने वाले हमारे मीडियाकर्मी ऐसे सवेदनशील मुद्दों को कितने हलके में लेते हैं, यह घटना इस बात का सबूत है। जो लोग संघ और उसके विचारों की जानकारी रखते हैं, उन्हें बखूबी मालूम है कि संघ वर्षों से यह दावा करता आया है। संघ समर्थक साहित्य और अखबारों में हमेशा से यह उधृत किया जाता रहा है॥ और तो और ख़ुद चैनल ने भी पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को कोट करते हुए इस सन्दर्भ में उनका बयान पेश किया। दोनों बयानों में फर्क इतना था की वाजपेयी इस घटना की तारीख 26 जनवरी 1963 बता रहे थे और मोहन भागवत 1964 । लेकिन कथ्य दोनों का एक ही था। इसलिए अगर यह शिगूफा है तो नया नही, बहुत पुराना है

शायद यह नौबत नहीं आती अगर इस स्टोरी को पेश करनेके पहले चैनल ने अपने कर्मियों से थोडा होमवर्क कराया होता। कम से कम विश्व सुन्दरी प्रतियोगिता में भारतीय दावेदार कविता चौधरी के परिजनों और उसकी जिन्दगी की कहानी जुटाने में जो म्हणत हुई, उससे तो कम ही ऊर्जा और संसाधन खर्च कर ज्यादा सुस्पष्ट ख़बर दी जा सकती थी। मगर बलिहारी आपके न्यूज सेंस और खबरों की प्राथमिकता की।

अब आप ही सोचिये क्या ज्यादा जरुरी था?

Wednesday, 23 January, 2008

सनसनी सिर्फ कश्मीर में ही है क्या?


"सन्नाटे को चीरती सनसनी फिर देगी दस्तक यह बताने के लिए कि..........." नाटकीयता से भरे एक क्राइम शो की यह पंक्ति दर्शकों के दिमाग पर वाकई बारम्बार दस्तक दे रही होगी। लेकिन इस शो में ही कुछ ऐसा भी है जो शायद देशभक्तों (खास कर जम्मू कश्मीर के बाशिंदों) को कलेजा चीरने जैसा लगे। लेकिन आश्चर्य है कि शो अपने उस रूप के साथ बदस्तूर जारी है।

अगर आप सनसनी देखते हों तो उसका लोगो सहज ही याद आ जाना चाहिए। जम्मू-कश्मीर के नक्शे को बीचों-बीच चीरता हुआ मोटे अक्षरों में लिखा है सनसनी। पहले पहल मुझे भ्रम हुआ कि यह जम्मू-कश्मीर स्पेशल है। लेकिन मंझे हुए एंकर ने जल्द ही इस भ्रम को दूर कर दिया।

आज सभी को मालूम है कि 'सनसनी' अपराध कथाओं पर आधारित कार्यक्रम है। तो क्या अपराध सिर्फ जम्मू-कश्मीर तक सीमित हैं? यह भी सच है कि इस कार्यक्रम में अभी तकरीबन उन सभी जगहों की खबरें होती है जहाँ तक हिन्दी चैनलों की पहुंच है। हाँ, ज्यादातर खबरें दिली-मुम्बई और इनके आस-पास के शहरों की होती है। ऐसे में जम्मू-कश्मीर के नक्शे का क्या औचित्य है?

जब सनसनी की शुरुआत हुई थी, शायद तब जम्मू-कश्मीर में अशांति कुछ ज्यादा थी। हो सकता है कि तब जम्मू-कश्मीर को विशेष रूप से कवर करने पर ध्यान रहा हो। (हालांकि सच्चाई तो इसके प्रोड्यूसर ही बता सकते हैं।) फिर समय के साथ जब सारी चीजें बदल सकती हैं तो एक लोगो क्यों नही बदल सकता?

Friday, 23 November, 2007

खबर किसकी????????

आजकल यह ट्रेंड तेजी से देखा जा रहा है कि एक चैनल किसी फुटेज को एक्सक्लूसिव बता कर प्रसारित करता है और उसके चंद मिनटों बाद वही फुटेज एक नये कलेवर के साथ दूसरे चैनल की एक्सक्लूसिव खबर बन जाती है? क्या इस दिशा में कॉपीराइट कानून कुछ नहीं कहता.
ताजा-तरीन मामला डी-कंपनी के विडियो का है. सबसे तेज चैनल ने रात आठ बजे इस वीडियो क्लिप को आधार बना कर एक विशेष कार्यक्रम का प्रसारण शुरु किया. उसका चिर-प्रतिद्वंदी भला कैसे पीछे रह सकता था. बमुश्किल आधा घंटा हुआ था कि नयी साज-सज्जा के साथ वही विडियो क्लिपिंग दूसरे चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज के रूप में मौजूद था. लब्बो-लुआब यह कि हम कर रहे हैं यह सनसनीखेज खुलासा. भले ही यह खबर घंटो पहले दिखायी जा चुकी हो.
कहानी नयी नहीं है. विधी -व्यवस्था से जुडी तमाम खबरों पर ध्यान देते ही स्पष्ट हो जाता है कि एक क्लिप किस तरह हर चैनल पर घूमती है. भागलपुर में पुलिसकर्मी और भीड द्वारा एक युवक की बर्बरता से हुई पिटाई की खबर भी इसका उदाहरण है. इस घटना की फुटेज सबसे पहले वहां के स्थानीय चैनल पीटीएन ने ली थी लेकिन लगभग हर चैनल यह दावा करता रहा कि सबसे तस्वीर उसने ली. हद तो तब हो गयी जब घटना के एक दिन बाद भी एक चैनल उस फुटेज कोप लाइव कह कर प्रसारित करता रहा.
वर्षों पहले गुडगांवा के होंडा फैक्ट्री में हुए लाठीचार्ज में भी कुछ ऐसी हालत बनी थी. तब चैनलों की दाल इसलिए नहीं गली कि तस्वीर लेने वाला शख्स खुद एक स्वतंत्र पत्रकार था.
एक क्लिप को हासिल करना और उसे अपनी लोकप्रियता के लिए भुनाना बुरा नहीं है लेकिन क्या हम जरा भी ईमानदारी नहीं दिखा सकते हैं. कई बार 'एक चैनल की खबर के अनुसार' जैसे जुमलों का प्रयोग दर्शकों को भ्रमित होने से बचाता है. टीवी चैनलों पर इस सतर्कता का भी अभाव दिख रहा है.

Thursday, 22 November, 2007

लाइव शो का ज़माना

शायद यही समय आ गया है। आए दिन टीवी चैनलों पर लाइव वीडियो की लाइन लगी हुई है. लेकिन सवाल है कि ये लाइव विडियो हैं किस चीज के. अगर आप टेलीविजन के नियमित दर्शक हैं तो समझने में देर नहीं लगेगी कि ये वीडियो हैं चोरी-सेंधमारी व मार-पीट जैसी वारदातों के. किसी बाजार में, शो-रूम के अंदर या फिर विदेशी हवाई अड्डों/ रेलवे स्टेशन के बाहर का दृश्य. थोडी सी माथापच्ची के बाद आपको यह जानने में भी देर नहीं लगेगी कि ये 'सस्ता माल' आता कहां से है.
यहां दो बातें गौर करने की हैं. पहला यह कि क्या वाकई ये वीडियो लाईव हैं? अगर हां, तो लाइव दिखाने के लिए सबसे उपयुक्त विषय क्या यही हैं?
इन समाचारों को गौर से देखने पर आप खुद पाएंगे एंकर कह रहे होते हैं- घटना कल दोपहर .. बजे की है. अब भूतकाल में कैसा लाइव होता है यह तो आप सोच ही सकते हैं.
दरअसल दुनियाभर में जैसे जैसे अपराध बढा है, लोगों ने अपने सुरक्षा के लिए बेहतर इंतजाम किये. इसी सिलसिले में सरी आंख यानी छुपे कैमरे के प्रयोग को बढावा मिला. विदेश में ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल कुछ ज्यादा ही हो रहा है. जब भी कोई वारदात होती है तो रेकार्डेड मूवमेंट्स आसानी से मीडिया को उपलब्ध करा दी जाती है. टीवी के लिए खबर भी बन गयी और दूसरी पार्टी को मुफ्त पब्लिसिटी भी मिल गयी.
ऐसा नहीं है कि उस समय दिखाने के लिए एकमात्र या सबसे बडी खबर वही हो. यह तो सभी जानते हैं कि हर समय कुछ न कुछ रचनात्मक गतिविधि कहीं न कहीं चलती रहती है. हां, उनकी कवरेज के लिए कुछ अतिरिक्त श्रम की जरूरत हो सकती है. लेकिन दिखाया तो वही जाएगा जो दिखाने वाले तय करेंगे.