यह सवाल इसलिए किया जा रहा है कि इस महीने के पहले ही दिन विश्व कैंसर शोध कोष ने एक रिपोर्ट जारी की. उस रिपोर्ट को भारतीय मीडिया में न के बराबर कवरेज मिली. टीवी समाचार चैनलों के 'झलक दिखला जा' समर्पित रवैये के कारण उनसे इस विषय पर कवरेज की उम्मीद भी बेमानी लगती थी लेकिन अगले दिन छपे अखबारों ने भी इस मामले में निराश किया.
दो नवंबर को प्रकाशित प्रमुख अखबारों में अकेले द टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस खबर को कवर किया. इस अखबार में बारहवें पन्ने पर दो कॉलम की खबर इस विषय में थी. अखबार ने विश्व कैंसर शोध कोष के की रिपोर्ट के हवाले से दी गयी जानकारियों का ब्यौरा दिया है. ग्राफिक्स का प्रयोग कर खबर को आकर्शक बनाने की कोशिश की गयी है.
इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों की बात करें तो सिर्फ बीबीसी हिंन्दी ने इस खबर को कवरेज दी. इसने भी शोध संस्थान द्वारा दी गयी जानकारियों और नये शोध के बारे में बताया है.
ये तो थी कवरेज की बात, अब लौटते हैं मूल प्रश्न पर और जानते हैं कि कवरेज जरूरी क्यों थी. कैंसर की भयावहता को बताने की शायद जरूरत नहीं है. अब तक इसके इलाज के दावे भर हो रहे हैं. वह इलाज भी इतना महंगा है कि आम लोगों के शायद स्वप्न ही बना रहे. नये शोध से पता चलता है कि खाने-पीने में परहेज रखकर और अपना वजन संतुलित रखकर इस बीमारी से बचा जा सकता है. ऐसे में यह जानकारी उस बडी के आबादी के लिए लाभकारक होगी जो समुचित इलाज के अभाव में बीमारि का दंश झेलती है.
बडे जनसमुदाय के हित की जानकारी देना समाचार माध्यमों का पहला कर्तव्य माना जाता रहा है. इसलिए इस शोध को मीडिया में उचित कवरेज मिलना अपेक्षित था. भारतीय मीडिया के वर्तमान रवैये ने साबित कर दिया कि वह जनता से जुडे मुद्दे खासकर, स्वास्थ्य के प्रति संवेदन्शील नहीं है.
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Saturday, 3 November 2007
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