जी हाँ, ऐसा कहना गलत नहीं होगा यदि आप अभी अभी हुए हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के एक चरण की कवरेज पर गौर करें। देश के विभिन्न हिस्सों में गिरता मतदान प्रतिशत जहाँ चिंता का विषय बन रहा है वहीं बर्फीले कबायली क्षेत्रों में मतदान प्रतिशत 65 प्रतिशत तक पहुंच गया। लेकिन यह खबर नहीं हो सकती। खबर तो सिर्फ यह हो सकती है कि नरेन्द्र मोदी कैसे हारते हारते जीत गये.
इसे सिर्फ संयोग कहें या लोकतंत्र के इस स्वयंभू चौथे खम्भे की परीक्षा, दोनों खबरें एक साथ बनी। जिस दिन हिमाचल में चुनाव हुए उसी दिन एक नामचीन संस्था की ओर से गुजरात के लिए चुनाव पूर्व सर्वेक्षण जारी किया गया। इसमें मोदी की जीत की संभावना बतायी गयी थी। कम से कम तीन अखबारों ने इसे पहले पन्ने पर जगह दी।
वहीं हिमाचल में हुए चुनाव की खबर सिर्फ दो अखबारों के पहले पन्ने पर जगह पा सकी वह भी 'एक नजर' कॉलम में। बमुश्किल दो लाइन की खबर। द हिन्दू, द इंडियन एक्सप्रेस, दैनिक भास्कर ने इसे चार चार कॉलम की जगह तो दी मगर अन्दर के पन्नों पर। वह भी निचले हिस्से में। हिन्दुस्तान और द हिन्दू के पहले पन्ने पर 'एक नज़र' कॉलम में यह खबर थी। वहीं दैनिक जागरण ने अंदरूनी पन्ने पर इसे दो कॉलम की जगह दी।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बात करें तो हिमाचल चुनाव को सबसे ज्यादा दो मिनट का समय एनडीटीवी इंडिया ने दिया। वह भी दो बुलेटिनों को मिला कर। टीआरपी में नंबर वन की होड़ लेने वाले स्टार न्यूज ने मात्र 30 सेकेंड का समय इस खबर को दिया। सबसे तेज चैनल को तो यहाँ तक पहुँचने की जरूरत नहीं। हालांकि यही चैनल कुछ दिन पहले हिमाचल में ही 450 साल से एक लामा के जिन्दा रहने की संभावना पर घंटों चर्चा कर चुका है।
इस दिन अखबारों के पहले पन्ने पर जो एक कॉमन खबर कही जा सके वह थी नंदीग्राम मसले पर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला। तो क्या राजनीति का मतलब सिर्फ गुजरात या पश्चिम बंगाल है? इस महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक घटना को दिखाना क्या मीडिया का काम नहीं है?
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Thursday, 15 November 2007
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