आजकल यह ट्रेंड तेजी से देखा जा रहा है कि एक चैनल किसी फुटेज को एक्सक्लूसिव बता कर प्रसारित करता है और उसके चंद मिनटों बाद वही फुटेज एक नये कलेवर के साथ दूसरे चैनल की एक्सक्लूसिव खबर बन जाती है? क्या इस दिशा में कॉपीराइट कानून कुछ नहीं कहता.
ताजा-तरीन मामला डी-कंपनी के विडियो का है. सबसे तेज चैनल ने रात आठ बजे इस वीडियो क्लिप को आधार बना कर एक विशेष कार्यक्रम का प्रसारण शुरु किया. उसका चिर-प्रतिद्वंदी भला कैसे पीछे रह सकता था. बमुश्किल आधा घंटा हुआ था कि नयी साज-सज्जा के साथ वही विडियो क्लिपिंग दूसरे चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज के रूप में मौजूद था. लब्बो-लुआब यह कि हम कर रहे हैं यह सनसनीखेज खुलासा. भले ही यह खबर घंटो पहले दिखायी जा चुकी हो.
कहानी नयी नहीं है. विधी -व्यवस्था से जुडी तमाम खबरों पर ध्यान देते ही स्पष्ट हो जाता है कि एक क्लिप किस तरह हर चैनल पर घूमती है. भागलपुर में पुलिसकर्मी और भीड द्वारा एक युवक की बर्बरता से हुई पिटाई की खबर भी इसका उदाहरण है. इस घटना की फुटेज सबसे पहले वहां के स्थानीय चैनल पीटीएन ने ली थी लेकिन लगभग हर चैनल यह दावा करता रहा कि सबसे तस्वीर उसने ली. हद तो तब हो गयी जब घटना के एक दिन बाद भी एक चैनल उस फुटेज कोप लाइव कह कर प्रसारित करता रहा.
वर्षों पहले गुडगांवा के होंडा फैक्ट्री में हुए लाठीचार्ज में भी कुछ ऐसी हालत बनी थी. तब चैनलों की दाल इसलिए नहीं गली कि तस्वीर लेने वाला शख्स खुद एक स्वतंत्र पत्रकार था.
एक क्लिप को हासिल करना और उसे अपनी लोकप्रियता के लिए भुनाना बुरा नहीं है लेकिन क्या हम जरा भी ईमानदारी नहीं दिखा सकते हैं. कई बार 'एक चैनल की खबर के अनुसार' जैसे जुमलों का प्रयोग दर्शकों को भ्रमित होने से बचाता है. टीवी चैनलों पर इस सतर्कता का भी अभाव दिख रहा है.
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Friday, 23 November 2007
Thursday, 15 November 2007
कहाँ है लोकतंत्र का चौथा खम्भा (चुनावों का मौसम है)
जी हाँ, ऐसा कहना गलत नहीं होगा यदि आप अभी अभी हुए हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के एक चरण की कवरेज पर गौर करें। देश के विभिन्न हिस्सों में गिरता मतदान प्रतिशत जहाँ चिंता का विषय बन रहा है वहीं बर्फीले कबायली क्षेत्रों में मतदान प्रतिशत 65 प्रतिशत तक पहुंच गया। लेकिन यह खबर नहीं हो सकती। खबर तो सिर्फ यह हो सकती है कि नरेन्द्र मोदी कैसे हारते हारते जीत गये.
इसे सिर्फ संयोग कहें या लोकतंत्र के इस स्वयंभू चौथे खम्भे की परीक्षा, दोनों खबरें एक साथ बनी। जिस दिन हिमाचल में चुनाव हुए उसी दिन एक नामचीन संस्था की ओर से गुजरात के लिए चुनाव पूर्व सर्वेक्षण जारी किया गया। इसमें मोदी की जीत की संभावना बतायी गयी थी। कम से कम तीन अखबारों ने इसे पहले पन्ने पर जगह दी।
वहीं हिमाचल में हुए चुनाव की खबर सिर्फ दो अखबारों के पहले पन्ने पर जगह पा सकी वह भी 'एक नजर' कॉलम में। बमुश्किल दो लाइन की खबर। द हिन्दू, द इंडियन एक्सप्रेस, दैनिक भास्कर ने इसे चार चार कॉलम की जगह तो दी मगर अन्दर के पन्नों पर। वह भी निचले हिस्से में। हिन्दुस्तान और द हिन्दू के पहले पन्ने पर 'एक नज़र' कॉलम में यह खबर थी। वहीं दैनिक जागरण ने अंदरूनी पन्ने पर इसे दो कॉलम की जगह दी।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बात करें तो हिमाचल चुनाव को सबसे ज्यादा दो मिनट का समय एनडीटीवी इंडिया ने दिया। वह भी दो बुलेटिनों को मिला कर। टीआरपी में नंबर वन की होड़ लेने वाले स्टार न्यूज ने मात्र 30 सेकेंड का समय इस खबर को दिया। सबसे तेज चैनल को तो यहाँ तक पहुँचने की जरूरत नहीं। हालांकि यही चैनल कुछ दिन पहले हिमाचल में ही 450 साल से एक लामा के जिन्दा रहने की संभावना पर घंटों चर्चा कर चुका है।
इस दिन अखबारों के पहले पन्ने पर जो एक कॉमन खबर कही जा सके वह थी नंदीग्राम मसले पर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला। तो क्या राजनीति का मतलब सिर्फ गुजरात या पश्चिम बंगाल है? इस महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक घटना को दिखाना क्या मीडिया का काम नहीं है?
इसे सिर्फ संयोग कहें या लोकतंत्र के इस स्वयंभू चौथे खम्भे की परीक्षा, दोनों खबरें एक साथ बनी। जिस दिन हिमाचल में चुनाव हुए उसी दिन एक नामचीन संस्था की ओर से गुजरात के लिए चुनाव पूर्व सर्वेक्षण जारी किया गया। इसमें मोदी की जीत की संभावना बतायी गयी थी। कम से कम तीन अखबारों ने इसे पहले पन्ने पर जगह दी।
वहीं हिमाचल में हुए चुनाव की खबर सिर्फ दो अखबारों के पहले पन्ने पर जगह पा सकी वह भी 'एक नजर' कॉलम में। बमुश्किल दो लाइन की खबर। द हिन्दू, द इंडियन एक्सप्रेस, दैनिक भास्कर ने इसे चार चार कॉलम की जगह तो दी मगर अन्दर के पन्नों पर। वह भी निचले हिस्से में। हिन्दुस्तान और द हिन्दू के पहले पन्ने पर 'एक नज़र' कॉलम में यह खबर थी। वहीं दैनिक जागरण ने अंदरूनी पन्ने पर इसे दो कॉलम की जगह दी।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बात करें तो हिमाचल चुनाव को सबसे ज्यादा दो मिनट का समय एनडीटीवी इंडिया ने दिया। वह भी दो बुलेटिनों को मिला कर। टीआरपी में नंबर वन की होड़ लेने वाले स्टार न्यूज ने मात्र 30 सेकेंड का समय इस खबर को दिया। सबसे तेज चैनल को तो यहाँ तक पहुँचने की जरूरत नहीं। हालांकि यही चैनल कुछ दिन पहले हिमाचल में ही 450 साल से एक लामा के जिन्दा रहने की संभावना पर घंटों चर्चा कर चुका है।
इस दिन अखबारों के पहले पन्ने पर जो एक कॉमन खबर कही जा सके वह थी नंदीग्राम मसले पर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला। तो क्या राजनीति का मतलब सिर्फ गुजरात या पश्चिम बंगाल है? इस महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक घटना को दिखाना क्या मीडिया का काम नहीं है?
Wednesday, 14 November 2007
सिर्फ एक लक्ष्मी है खबर, हजारों लछमिनिया नहीं
शायद यही कहना चाह रही है भारत की इलेक्ट्रोनिक मीडिया. अभी कुछ दिनों पहले एक दो वर्षीया बच्ची के आपरेशन की खबर मीडिया में छाई रही। इतना ही नहीं डाक्टरों ने जैसे ही मोहलत दी टीवी की ब्रेकिंग न्यूज तैयार हो गयी -'आपरेशन के बाद लक्ष्मी पहली बार'।
फिर तो शुरू हो गया सिलसिला स्पेशल दर स्पेशल। नही तो कम से कम हर बुलेटिन की बड़ी खबर तो इसे बनाना ही था। भले ही इस दिन नंदीग्राम देश की बड़ी राजनीतिक पार्टियों को बेनकाब कर रहा हो।
आप कहेंगे कि मैं राजनिती की बोरियत भरी बहस में उलझाए रखना चाहता हूँ तो आइए उस खबर की ओर चलें जो राजनीति की नहीं बल्कि इसी लक्ष्मी कि बिरादरी से जुडी हुई है। यह खबर आयी भी उसी दरम्यान जब लक्ष्मी का आपरेशन हो चुका था और मीडियाकर्मी उसकी सलामती की खबर को पुष्ट करने के लिए बेताब थे। यह एक या दो नहीं बल्कि पूरी दुनिया की महिलाओं से जुडी खबर थी।
लक्ष्मी के आपरेशन के शायद अगले ही दिन एक अंतरराष्ट्रीय संस्था की रिपोर्ट आई जिसमें सामाजिक -सार्वजनिक जीवन में लिंगभेद की स्थिति का वर्णन था। अव्वल हालत वाले देशों कि कतार में भारत का स्थान 128 वां था। यह खबर सबसे पहले मुझे बिजनस स्टैण्डर्ड नामक अखबार में देखने को मिली। आश्चर्य लगा कि किसी भी बडे चैनल ने इस खबर को नहीं दिखाया था।
शायद ये दुनिया भर की लछमिनिया इन चैनलों की टीआरपी उतनी नही बढ़ा पाती जितनी एक 'लक्ष्मी' से मिली हो। इसलिए तो एक लक्ष्मी ही खबर है। हजारो लछमिनिया नहीं। है ना.
फिर तो शुरू हो गया सिलसिला स्पेशल दर स्पेशल। नही तो कम से कम हर बुलेटिन की बड़ी खबर तो इसे बनाना ही था। भले ही इस दिन नंदीग्राम देश की बड़ी राजनीतिक पार्टियों को बेनकाब कर रहा हो।
आप कहेंगे कि मैं राजनिती की बोरियत भरी बहस में उलझाए रखना चाहता हूँ तो आइए उस खबर की ओर चलें जो राजनीति की नहीं बल्कि इसी लक्ष्मी कि बिरादरी से जुडी हुई है। यह खबर आयी भी उसी दरम्यान जब लक्ष्मी का आपरेशन हो चुका था और मीडियाकर्मी उसकी सलामती की खबर को पुष्ट करने के लिए बेताब थे। यह एक या दो नहीं बल्कि पूरी दुनिया की महिलाओं से जुडी खबर थी।
लक्ष्मी के आपरेशन के शायद अगले ही दिन एक अंतरराष्ट्रीय संस्था की रिपोर्ट आई जिसमें सामाजिक -सार्वजनिक जीवन में लिंगभेद की स्थिति का वर्णन था। अव्वल हालत वाले देशों कि कतार में भारत का स्थान 128 वां था। यह खबर सबसे पहले मुझे बिजनस स्टैण्डर्ड नामक अखबार में देखने को मिली। आश्चर्य लगा कि किसी भी बडे चैनल ने इस खबर को नहीं दिखाया था।
शायद ये दुनिया भर की लछमिनिया इन चैनलों की टीआरपी उतनी नही बढ़ा पाती जितनी एक 'लक्ष्मी' से मिली हो। इसलिए तो एक लक्ष्मी ही खबर है। हजारो लछमिनिया नहीं। है ना.
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