Showing posts with label मीडिया. Show all posts
Showing posts with label मीडिया. Show all posts

Wednesday, 23 January 2008

सनसनी सिर्फ कश्मीर में ही है क्या?


"सन्नाटे को चीरती सनसनी फिर देगी दस्तक यह बताने के लिए कि..........." नाटकीयता से भरे एक क्राइम शो की यह पंक्ति दर्शकों के दिमाग पर वाकई बारम्बार दस्तक दे रही होगी। लेकिन इस शो में ही कुछ ऐसा भी है जो शायद देशभक्तों (खास कर जम्मू कश्मीर के बाशिंदों) को कलेजा चीरने जैसा लगे। लेकिन आश्चर्य है कि शो अपने उस रूप के साथ बदस्तूर जारी है।

अगर आप सनसनी देखते हों तो उसका लोगो सहज ही याद आ जाना चाहिए। जम्मू-कश्मीर के नक्शे को बीचों-बीच चीरता हुआ मोटे अक्षरों में लिखा है सनसनी। पहले पहल मुझे भ्रम हुआ कि यह जम्मू-कश्मीर स्पेशल है। लेकिन मंझे हुए एंकर ने जल्द ही इस भ्रम को दूर कर दिया।

आज सभी को मालूम है कि 'सनसनी' अपराध कथाओं पर आधारित कार्यक्रम है। तो क्या अपराध सिर्फ जम्मू-कश्मीर तक सीमित हैं? यह भी सच है कि इस कार्यक्रम में अभी तकरीबन उन सभी जगहों की खबरें होती है जहाँ तक हिन्दी चैनलों की पहुंच है। हाँ, ज्यादातर खबरें दिली-मुम्बई और इनके आस-पास के शहरों की होती है। ऐसे में जम्मू-कश्मीर के नक्शे का क्या औचित्य है?

जब सनसनी की शुरुआत हुई थी, शायद तब जम्मू-कश्मीर में अशांति कुछ ज्यादा थी। हो सकता है कि तब जम्मू-कश्मीर को विशेष रूप से कवर करने पर ध्यान रहा हो। (हालांकि सच्चाई तो इसके प्रोड्यूसर ही बता सकते हैं।) फिर समय के साथ जब सारी चीजें बदल सकती हैं तो एक लोगो क्यों नही बदल सकता?

Thursday, 15 November 2007

कहाँ है लोकतंत्र का चौथा खम्भा (चुनावों का मौसम है)

जी हाँ, ऐसा कहना गलत नहीं होगा यदि आप अभी अभी हुए हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के एक चरण की कवरेज पर गौर करें। देश के विभिन्न हिस्सों में गिरता मतदान प्रतिशत जहाँ चिंता का विषय बन रहा है वहीं बर्फीले कबायली क्षेत्रों में मतदान प्रतिशत 65 प्रतिशत तक पहुंच गया। लेकिन यह खबर नहीं हो सकती। खबर तो सिर्फ यह हो सकती है कि नरेन्द्र मोदी कैसे हारते हारते जीत गये.
इसे सिर्फ संयोग कहें या लोकतंत्र के इस स्वयंभू चौथे खम्भे की परीक्षा, दोनों खबरें एक साथ बनी। जिस दिन हिमाचल में चुनाव हुए उसी दिन एक नामचीन संस्था की ओर से गुजरात के लिए चुनाव पूर्व सर्वेक्षण जारी किया गया। इसमें मोदी की जीत की संभावना बतायी गयी थी। कम से कम तीन अखबारों ने इसे पहले पन्ने पर जगह दी।
वहीं हिमाचल में हुए चुनाव की खबर सिर्फ दो अखबारों के पहले पन्ने पर जगह पा सकी वह भी 'एक नजर' कॉलम में। बमुश्किल दो लाइन की खबर। द हिन्दू, द इंडियन एक्सप्रेस, दैनिक भास्कर ने इसे चार चार कॉलम की जगह तो दी मगर अन्दर के पन्नों पर। वह भी निचले हिस्से में। हिन्दुस्तान और द हिन्दू के पहले पन्ने पर 'एक नज़र' कॉलम में यह खबर थी। वहीं दैनिक जागरण ने अंदरूनी पन्ने पर इसे दो कॉलम की जगह दी।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बात करें तो हिमाचल चुनाव को सबसे ज्यादा दो मिनट का समय एनडीटीवी इंडिया ने दिया। वह भी दो बुलेटिनों को मिला कर। टीआरपी में नंबर वन की होड़ लेने वाले स्टार न्यूज ने मात्र 30 सेकेंड का समय इस खबर को दिया। सबसे तेज चैनल को तो यहाँ तक पहुँचने की जरूरत नहीं। हालांकि यही चैनल कुछ दिन पहले हिमाचल में ही 450 साल से एक लामा के जिन्दा रहने की संभावना पर घंटों चर्चा कर चुका है।
इस दिन अखबारों के पहले पन्ने पर जो एक कॉमन खबर कही जा सके वह थी नंदीग्राम मसले पर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला। तो क्या राजनीति का मतलब सिर्फ गुजरात या पश्चिम बंगाल है? इस महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक घटना को दिखाना क्या मीडिया का काम नहीं है?

Wednesday, 14 November 2007

सिर्फ एक लक्ष्मी है खबर, हजारों लछमिनिया नहीं

शायद यही कहना चाह रही है भारत की इलेक्ट्रोनिक मीडिया. अभी कुछ दिनों पहले एक दो वर्षीया बच्ची के आपरेशन की खबर मीडिया में छाई रही। इतना ही नहीं डाक्टरों ने जैसे ही मोहलत दी टीवी की ब्रेकिंग न्यूज तैयार हो गयी -'आपरेशन के बाद लक्ष्मी पहली बार'।

फिर तो शुरू हो गया सिलसिला स्पेशल दर स्पेशल। नही तो कम से कम हर बुलेटिन की बड़ी खबर तो इसे बनाना ही था। भले ही इस दिन नंदीग्राम देश की बड़ी राजनीतिक पार्टियों को बेनकाब कर रहा हो।

आप कहेंगे कि मैं राजनिती की बोरियत भरी बहस में उलझाए रखना चाहता हूँ तो आइए उस खबर की ओर चलें जो राजनीति की नहीं बल्कि इसी लक्ष्मी कि बिरादरी से जुडी हुई है। यह खबर आयी भी उसी दरम्यान जब लक्ष्मी का आपरेशन हो चुका था और मीडियाकर्मी उसकी सलामती की खबर को पुष्ट करने के लिए बेताब थे। यह एक या दो नहीं बल्कि पूरी दुनिया की महिलाओं से जुडी खबर थी।

लक्ष्मी के आपरेशन के शायद अगले ही दिन एक अंतरराष्ट्रीय संस्था की रिपोर्ट आई जिसमें सामाजिक -सार्वजनिक जीवन में लिंगभेद की स्थिति का वर्णन था। अव्वल हालत वाले देशों कि कतार में भारत का स्थान 128 वां था। यह खबर सबसे पहले मुझे बिजनस स्टैण्डर्ड नामक अखबार में देखने को मिली। आश्चर्य लगा कि किसी भी बडे चैनल ने इस खबर को नहीं दिखाया था।

शायद ये दुनिया भर की लछमिनिया इन चैनलों की टीआरपी उतनी नही बढ़ा पाती जितनी एक 'लक्ष्मी' से मिली हो। इसलिए तो एक लक्ष्मी ही खबर है। हजारो लछमिनिया नहीं। है ना.

Wednesday, 7 November 2007

प्रधानमंत्री से बड़ा है सचिन का दर्द

पिछले दिनों टीवी चैनलों पर एक लाइन खूब सुनी गयी -"फिर छलका मनमोहन का दर्द". परमाणु करार पर गतिरोध और गठबंधन की राजनीति को लेकर प्रधानमंत्री ने पिछले दिनों कई बयान दी जिन्हें उनकी पीडा से जोडा गया। लेकिन यह दर्द इतनी ही महत्ता रखता था कि महज कुछ बुलेटिनों की सुर्ख़ियों में रह गया या फिर दो चार मिनट की खबर इस पर बन सकी।

यह कप्तानी इनकार से करने के पीछे छिपा सचिन का दर्द तो था नहीं जिसके लिए विशेष कार्यक्रम दिखाए जाएँ या समाचार चैनलों के कीमती घंटे उस पर खर्च किये जाएँ। सचिन ने कप्तानी से इनकार किया उसके ठीक एक दिन पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संघवाद की अवधारणा पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में कहा था कि एक दल का शासन ही लोकतंत्र के हित में है।

यह राष्ट्रीय राजनीति पर देश के सबसे बडे नेता का एक अंतर्राष्ट्रीय मंच से दिया गया बयान था। इससे पहले भी राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय मंचों से वह बोलते रहे। जिसे टेलीविजन २-४ मिनट का समय मिलता रहा। गिने चुने ही विशेष कार्यक्रम इस पर आये होंगे। यहाँ डीडी न्यूज को अपवाद माना जा सकता है जिसके लिए सरकारी खबरें पहली प्राथमिकता रहती है।

लेकिन सचिन का अब का इनकार हो या वर्षों पहले टेनिस एल्बो में उठा दर्द। मीडिया के लिए उसे कवर करना सबसे जरूरी रहा। न सिर्फ चैनलों ने घंटो का समय दिया बल्कि अखबारों के लीड स्पेस में भी इसकी खासी जगह बनी रही।

प्रधानमंत्री के हालिया बयान को सबसे ज्यादा समय दिया सहारा ग्रुप के चैनल 'समय' ने। इसने कुल ११ मिनट का समय दिया था। इसी चैनल पर अगले दिन सचिन के लिए खर्च समय को देखें तो वह ज्यादा ही (13 मिनट) है। अन्य चैनलों पर प्रधानमंत्री के बयान को औसतन २ से ५ मिनट का समय मिला जबकि सचिन सचिन के इनकार की खबर को औसतन आधे घंटे का समय दिया गया।

तो अब किसी को यह मानने में हर्ज नहीं होना चाहिए कि इस देश में सचिन का दर्द प्रधानमंत्री के दर्द से बढ़ कर है।

Monday, 5 November 2007

मीडिया में यूएसपी का नया फ़ंडा बना पाकिस्तान

पिछले दिनों समालोचक पर एक आलेख की प्रतिक्रिया में काकेश जी ने लिखा था कि मीडिया वही झलक दिखलाता है जो बिकता है. अब लगता है कि मीडिया के इस बाजार में तेजी से बदलाव आया है. हमारा पडोसी देश पाकिस्तान मीडिया के लिए यूएसपी (यूनिक सेल पॉइंट) का नया फंडा बन गया है. क्रिकेट और बॉलीवुड की प्राइम टाइम में बडी हिस्सेदारी बनी हुई है लेकिन पाकिस्तान की घटनाओं ने बहुत तेजी से प्राइम टाइम और लीड स्पेस दोनों में जगह बनायी है. इसकी ताजा मिसाल हम देख सकते हैं पाक में इमरजेंसी की घोषणा को मिली कवरेज में.

इमरजेंसी की घोषणा के बाद हालत कुछ यूं बनी कि लगभग सभी मुख्य समाचार चैनलों पर पूरे प्राइम टाइम में यही खबर चलती रही. मानो उस दिन देश में कोई खबर ही नहीं थी. कुछेक बार दशहरा या स्वतंत्रता दिवस परेड जैसे मौकों को छोड दें शायद पहली बार भारतीय नीजि मीडिया में इतनी एकरूपता दिखायी दी.

अभी हाल ही में अपना काया कल्प करने वाले चैनल सहारा समय ने तो गज़ब कर दिया. इस चैनल पर पूरे चार घंटे के दौरान सिर्फ एक कमर्शियल ब्रेक लिया गया जो कार्य्क्रम के बिल्कुल अंतिम हिस्से (10:45-10:47 pm) में था. चैनल ने 3 घंटे और 56 मिनट (कुल 130 मिनट) लगातार पाकिस्तान को समर्पित किया.

अन्य चैनलों का भी ग्राफ कुछ इसी तरह का है। सबसे तेज आजतक ने कुल 150 मिनट इस मुद्दे पर खर्च किये तो जी न्यूज ने 130 मिनट पाकिस्तान के नाम किया. स्टार न्यूज ने भी 96 मिनट इमरजेंसी की खबर पर खर्च किये। इस दिन इस चैनल का कुल न्यूज टाइम 132 मिनट था।

यहाँ समय की गिनती का मकसद आपको बताना है कि सामान्यतया निजी चैनल प्राइम टाइम में 120 मिनट के आसपास समय समाचारों के लिए खर्च करते हैं जो पाकिस्तान में इमरजेंसी की खबर के कारण बढ़ गया। यानी की पाकिस्तान में जो कुछ हो रहा है उसके लिए टीवी चैनल अपने व्यावसायिक हितों की कुर्बानी दे सकते हैं। काश! अपने देश की महत्वपूर्ण खबरों के लिए भी चैनल ऐसा कर पाते।

इस दौड में कोई अलग था तो वह है सार्वजनिक क्षेत्र का न्यूज चैनल डीडी न्यूज. इसने पूरे घटनाक्रम पर 37 मिनट समय खर्च किया.

घटना के दूसरे दिन छपे अखबारों में भी यह खबर पहली खबर रही। यहाँ तक तो ठीक है पर कई अखबारों ने पूरा का पूरा पन्ना ही पाकिस्तान के नाम कर दिया।

अगर हम थोडा ही पीछे जाएँ तो देखेंगे कि मोहतरमा भुट्टो की वतन वापसी, नवाज शरीफ के साथ हुआ नाटक, जस्टिस चौधरी के समर्थन में हुए प्रदर्शन और बेनजीर के काफिले पर हमले की खबर को मीडिया ने हाथों हाथ लिया था। भले ही अजमेर में धमाके होने के समय यही मीडिया अमिताभ बच्चन के जन्मदिन कि तैयारी करना नहीं भूले।

यहाँ हमारे कहने का मतलब यह नहीं है कि पाकिस्तान को इतनी कवरेज क्यों दी जा रही है बल्की हम यह जानना चाहते हैं कि इसे एनी विषयों पर हावी क्यो होने दिया जा रहा है। इस कवरेज के पीछे पड़ोसी के साथ संवेदनशील रिश्तों की बात बार बार की जाती है। लेकिन अगर हमें पडोसियों या दूसरे देशों से रिश्तों की इतनी ही चिंता है तो सोनिया गांधी के चीन दौरे को, प्रधान मंत्री के अफ्रिका दौरे को ऎसी कवरेज क्यों नहीं मिल पाती है। प्रधानमंत्री इबसा की बैठक में कितने ही व्यावसायिक, आर्थिक समझौते कर लें खबर तो यही बनेगी कि उन्होने परमाणु करार पर क्या कहा। वह भी शायद कुछ ही चैनलों तक सीमित रहे।

तो क्या भारतीय मीडिया पाकिस्तान के मामले मन किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हो चुका है? राजनीति में विवादों का सबब बन चुका शब्द तुष्टिकरण क्या अब मीडिया में भी अपना रंग दिखायेगा? और सबसे बढ़कर सवाल कि क्या मीडिया पूर्वाग्रह मुक्त और संतुलित परिणाम देने कि लिए तैयार है?

Saturday, 3 November 2007

परहेज से रुके कैंसर: तो क्या करे मीडिया?

यह सवाल इसलिए किया जा रहा है कि इस महीने के पहले ही दिन विश्व कैंसर शोध कोष ने एक रिपोर्ट जारी की. उस रिपोर्ट को भारतीय मीडिया में न के बराबर कवरेज मिली. टीवी समाचार चैनलों के 'झलक दिखला जा' समर्पित रवैये के कारण उनसे इस विषय पर कवरेज की उम्मीद भी बेमानी लगती थी लेकिन अगले दिन छपे अखबारों ने भी इस मामले में निराश किया.

दो नवंबर को प्रकाशित प्रमुख अखबारों में अकेले द टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस खबर को कवर किया. इस अखबार में बारहवें पन्ने पर दो कॉलम की खबर इस विषय में थी. अखबार ने विश्व कैंसर शोध कोष के की रिपोर्ट के हवाले से दी गयी जानकारियों का ब्यौरा दिया है. ग्राफिक्स का प्रयोग कर खबर को आकर्शक बनाने की कोशिश की गयी है.

इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों की बात करें तो सिर्फ बीबीसी हिंन्दी ने इस खबर को कवरेज दी. इसने भी शोध संस्थान द्वारा दी गयी जानकारियों और नये शोध के बारे में बताया है.

ये तो थी कवरेज की बात, अब लौटते हैं मूल प्रश्न पर और जानते हैं कि कवरेज जरूरी क्यों थी. कैंसर की भयावहता को बताने की शायद जरूरत नहीं है. अब तक इसके इलाज के दावे भर हो रहे हैं. वह इलाज भी इतना महंगा है कि आम लोगों के शायद स्वप्न ही बना रहे. नये शोध से पता चलता है कि खाने-पीने में परहेज रखकर और अपना वजन संतुलित रखकर इस बीमारी से बचा जा सकता है. ऐसे में यह जानकारी उस बडी के आबादी के लिए लाभकारक होगी जो समुचित इलाज के अभाव में बीमारि का दंश झेलती है.

बडे जनसमुदाय के हित की जानकारी देना समाचार माध्यमों का पहला कर्तव्य माना जाता रहा है. इसलिए इस शोध को मीडिया में उचित कवरेज मिलना अपेक्षित था. भारतीय मीडिया के वर्तमान रवैये ने साबित कर दिया कि वह जनता से जुडे मुद्दे खासकर, स्वास्थ्य के प्रति संवेदन्शील नहीं है.

Thursday, 1 November 2007

किसका जन्मदिन मनाए मीडिया

फिल्मस्टार और क्रिकेटर भले ही मीडिया के लिए ब्रेकिंग न्यूज बनते रहें लेकिन यह स्वीकार करने में कोई शक नहीं होना चाहिए कि देश के रहनुमाओं को सम्मान देना हमारी मीडिया को नहीं आता है. शायद यह संयोग ही है कि 31 अक्टूबर को देश की एक नहीं दो विभूतियों से जुडा है. देश की पहली और इकलौती महिला प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी की पुण्यतिथी और प्रथम गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्मदिन एक ही तारीख को होने के बावजूद मीडिया दोनों को ही भूल जाती है.

यहां आप अपने आप से एक सवाल पूछ कर देखें कि 11 अक्टूबर को किस भारतीय हस्ती का जन्मदिन था? सहज ही आपको याद आएंगे हिन्दी फिल्मों के महानायक अमिताभ बच्चन. इक्के दुक्के ही चैनल हैं जिन्होंने इस जन्मदिन के सेलीब्रेशन के लिए स्पेशल दिखा कर आपको याद न दिलाया हो. लेकिन इतिहास की किताबों मगजमारी करके ही आप जान पायेंगे कि इसी दिन संपूर्ण क्रान्ती के जनक जयप्रकाश नारायण भी जन्मे थे. बहरहाल, हम लौटते हैं ताजा हालात पर्.

कुछ अखबार या चैनलों में खबर ये बनती है कि 1984 के दंगापीडितों ने प्रदर्शन किया. यह खबर मीडिया को महत्वपूर्ण लगती है मगर इंदिरा गांधी का देश के लिए क्या योगदान रहा इस को याद करना जरूरी नहीं समझा जाता है. हां सरकारी नियंत्रण के चैनल डीडी न्यूज पर विशेष कार्यक्रम जरूर दिखाये जाते हैं. शायद मान लिया गया है कि सरकार चलाने वालों को याद रखने की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ सरकारी संस्थानों की ही है.

प्रिंट मीडिया का भी रूख इस मामले में बहुत अच्छा नहीं है. इस दिन गिने चुने अखबारों के संपादकीय पृष्ठ पर इस विषय से जुडे लेख थे. राजस्थान पत्रिका ने विशेष फीचर के रूप में दोनों नेताओं के जीवन पर लेख छापे. अन्य अखबारों में इस विषय को न के बराबर महत्व मिला.

हां इस दिन सुर्खियों में एक दिवंगत नेता का नाम जरूर था. उनके किसी काम के लिए नहीं बल्कि उन्हीं के हत्या के आरोपी सगे भाई द्वारा एक इल्जाम मढने के कारण. क्या मीडिया ने यह ध्रुवसत्य मान लिया है कि राजनेताओं के जीवन में कोई भी अच्छी चीज नहीं है जिसे कम से कम उनके पुण्यतिथि या जन्मतिथी पर याद किया जा सके? कम से कम जिनलोगों ने अपना जीवन देश की राजनीति में ही खापाया उनके साथ तो न्याय हो.

Tuesday, 30 October 2007

टीवी चैनल की नयी भूमिका: मचाएं बबाल

यह हम नहीं कहते खुद एक टीवी चैनल कहता है. वही चैनल जो आज कल सबसे ज्यादा चर्चा में है. जरा गौर कीजिए आजतक के कार्यक्रम 10 तक में एंकर द्वारा पूरे जोशो-खरोश से पढे गये इस समाचार पर- "तहलका आजतक के खुलासे से हिला पूरा हिन्दुस्तान, राजनीति में उबाल देशभर में बबाल."
क्या यह मीडिया की परिष्कृत भाषा है? भाषा को लेकर संतुलन क्यों नहीं बनाया गया? भाषा के इस गलत प्रयोग ने एक बार मीडिया की नैतिकता और जिम्मेदारी पर एक बार फिर सवाल खडे कर दिये.
अगर बबाल की स्थिति बनती ही तो क्या चैनल देश की जनता से शांति- सद्भाव बनाए रखने की अपील नहीं कर सकता था. चैनल ने वैधानिक चेतावनी दिखायी कि कार्यक्रम का बच्चों और कमजोर दिल वालों पर बुरा असर पर सकता है. वही चैनल एक पंक्ति में यह अपील भी क्यों नहीं कर पाता है कि दर्शक कोई ऐसी प्रतिक्रिया न दें जिससे सामाजिक सद्भाव पर प्रतिकूल प्रभाव पडे. अगर किसी कारण से देश के हिस्से में सामुदायिक हिंसा फैलती तो क्या चैनल आगे बढ कर इनकी जिम्मेदारी लेता?
कार्यक्रम के दौरान भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद बार बार संकेतों में कहते रहे कि "सांप्रदायिक तनाव में जिस जिम्मेदारी का अहसास दिखाया जाना चाहिए वह आपका चैनल भी शायद नहीं दिख सका है." मगर इस पर ध्यान देने की जरूरत किसे पडी थी? खुद जिम्मेदारी निभायें या नहीं हमें टोकने वाला कौन है?
चैनल दो दिन पहले से सबसे बडे कलंक का खुलासा करने का प्रचार कर रहा था. निश्चय ही चैनल को यह मालूम था कि वह इस समय के सबसे ज्यादा विवादास्पद मुद्दे को उठाने जा रहा है. इसलिए उसकी जिम्मेदारी बनती थी कि वह इस कार्यक्रम के बाद पैदा हो सकने वाले सभी हालातों से निपटने की पूरी तैयारी करे.