फिल्मस्टार और क्रिकेटर भले ही मीडिया के लिए ब्रेकिंग न्यूज बनते रहें लेकिन यह स्वीकार करने में कोई शक नहीं होना चाहिए कि देश के रहनुमाओं को सम्मान देना हमारी मीडिया को नहीं आता है. शायद यह संयोग ही है कि 31 अक्टूबर को देश की एक नहीं दो विभूतियों से जुडा है. देश की पहली और इकलौती महिला प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी की पुण्यतिथी और प्रथम गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्मदिन एक ही तारीख को होने के बावजूद मीडिया दोनों को ही भूल जाती है.
यहां आप अपने आप से एक सवाल पूछ कर देखें कि 11 अक्टूबर को किस भारतीय हस्ती का जन्मदिन था? सहज ही आपको याद आएंगे हिन्दी फिल्मों के महानायक अमिताभ बच्चन. इक्के दुक्के ही चैनल हैं जिन्होंने इस जन्मदिन के सेलीब्रेशन के लिए स्पेशल दिखा कर आपको याद न दिलाया हो. लेकिन इतिहास की किताबों मगजमारी करके ही आप जान पायेंगे कि इसी दिन संपूर्ण क्रान्ती के जनक जयप्रकाश नारायण भी जन्मे थे. बहरहाल, हम लौटते हैं ताजा हालात पर्.
कुछ अखबार या चैनलों में खबर ये बनती है कि 1984 के दंगापीडितों ने प्रदर्शन किया. यह खबर मीडिया को महत्वपूर्ण लगती है मगर इंदिरा गांधी का देश के लिए क्या योगदान रहा इस को याद करना जरूरी नहीं समझा जाता है. हां सरकारी नियंत्रण के चैनल डीडी न्यूज पर विशेष कार्यक्रम जरूर दिखाये जाते हैं. शायद मान लिया गया है कि सरकार चलाने वालों को याद रखने की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ सरकारी संस्थानों की ही है.
प्रिंट मीडिया का भी रूख इस मामले में बहुत अच्छा नहीं है. इस दिन गिने चुने अखबारों के संपादकीय पृष्ठ पर इस विषय से जुडे लेख थे. राजस्थान पत्रिका ने विशेष फीचर के रूप में दोनों नेताओं के जीवन पर लेख छापे. अन्य अखबारों में इस विषय को न के बराबर महत्व मिला.
हां इस दिन सुर्खियों में एक दिवंगत नेता का नाम जरूर था. उनके किसी काम के लिए नहीं बल्कि उन्हीं के हत्या के आरोपी सगे भाई द्वारा एक इल्जाम मढने के कारण. क्या मीडिया ने यह ध्रुवसत्य मान लिया है कि राजनेताओं के जीवन में कोई भी अच्छी चीज नहीं है जिसे कम से कम उनके पुण्यतिथि या जन्मतिथी पर याद किया जा सके? कम से कम जिनलोगों ने अपना जीवन देश की राजनीति में ही खापाया उनके साथ तो न्याय हो.
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Thursday, 1 November 2007
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